Guinea-Bissau: पश्चिम अफ्रीका के गिनी-बिसाऊ (Guinea-Bissau) में बुधवार को अचानक सेना ने सत्ता पर कब्जा कर लिया, जिससे पूरा देश एक बार फिर गंभीर राजनीतिक संकट में फंस गया है। अफ्रीका का यह छोटा लेकिन रणनीतिक रूप से अहम देश पहले भी कई सैन्य हस्तक्षेप झेल चुका है और इस बार हालात और भी ज्यादा विस्फोटक प्रतीत हो रहे हैं।
अचानक हुई गोलीबारी से दहशत
दोपहर के समय राजधानी बिसाऊ में राष्ट्रपति भवन के आसपास अचानक भारी गोलीबारी शुरू हुई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सैन्य वाहनों ने पूरे क्षेत्र को घेर लिया और मुख्य सड़कों पर तुरंत बैरिकेड्स खड़े कर दिए। शहर के कई हिस्सों में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है। इस घटनाक्रम के बाद नागरिकों में दहशत फैल गई और लोग अपने परिवारों को लेकर सुरक्षित स्थानों की ओर भागते दिखाई दिए।
सेना ने जारी किया बयान
सेना ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि उसने देश की “पूर्ण प्रशासनिक और सुरक्षा नियंत्रण” संभाल लिया है। इसके साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सीमाएं अस्थायी रूप से सील कर दीं और हाल ही में हुए राष्ट्रपति व संसदीय चुनावों की प्रक्रिया को भी रोक दिया। यह कदम चुनाव के केवल तीन दिन बाद उठाया गया है, जिसने राजनीतिक संकट को और गहरा कर दिया है।
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राष्ट्रपति कहां लापता?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यह है कि मौजूदा राष्ट्रपति उमरो सिस्सोको एम्बालो आखिर हैं कहां? तख्तापलट के कई घंटे गुजरने के बाद भी न सेना ने उनकी स्थिति स्पष्ट की है और न ही राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से कोई बयान आया है। उनकी गुमशुदगी ने पूरे देश में अनिश्चितता की भावना को कई गुना बढ़ा दिया है।
विश्लेषकों के अनुसार, यह तख्तापलट अचानक नहीं बल्कि लंबे समय से हो रहे राजनीतिक संघर्ष का परिणाम है। हालिया चुनाव पहले ही विवादों के घेरे में थे। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने अपनी-अपनी जीत का दावा कर दिया था, जबकि आधिकारिक नतीजे अभी आए ही नहीं थे। यह ठीक 2019 जैसी स्थिति बनती दिख रही थी, जब चुनावी नतीजों को लेकर महीनों तक टकराव चलता रहा था।
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पद छोड़ने से किया था इनकार
विवाद यहीं खत्म नहीं हुए। सुप्रीम कोर्ट ने प्रमुख विपक्षी दल PAIGC को चुनाव लड़ने से रोक दिया था। विपक्ष ने इसे खुला राजनीतिक दमन बताया। दूसरी ओर आलोचक कहते हैं कि राष्ट्रपति एम्बालो का कार्यकाल फरवरी में ही खत्म हो चुका था, लेकिन उन्होंने पद छोड़ने से साफ इनकार कर दिया। इस वजह से सत्ता संघर्ष और गहरा गया।
वहीं गिनी-बिसाऊ 1974 में आज़ादी के बाद से चार तख्तापलट देख चुका है और यह पांचवां बड़ा कदम माना जा रहा है। देश की लगभग 20 लाख की आबादी गरीबी, कमजोर शासन और अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी जैसे मुद्दों से जूझती रही है, जिससे अस्थिरता लगातार बनी रहती है। फिलहाल न ECOWAS, न अफ्रीकी संघ और न संयुक्त राष्ट्र ने कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया दी है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय हालात पर करीबी नजर रखे हुए है। देश में डर का माहौल है और लोकतंत्र का भविष्य एक बार फिर सवालों में है। गिनी-बिसाऊ अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां से या तो स्थिरता की राह निकलेगी या एक और लंबी अराजकता का चक्र शुरू होगा।















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