New Delhi: हिंदू धर्म में दीपक केवल रोशनी का साधन नहीं बल्कि सकारात्मक ऊर्जा और शुभता का प्रतीक माना गया है। जहां दीपक जलता है, वहां अंधकार और नकारात्मकता समाप्त होती है, और देवी-देवताओं का वास होता है। दीपावली, नवरात्रि या किसी भी शुभ अवसर पर दीपक जलाना आत्मिक शुद्धि और समृद्धि का प्रतीक है।
शास्त्रों में क्या कहा गया है
धर्म ग्रंथों में दीपक को “ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक” बताया गया है। यह घर ही नहीं, मन के अंधकार को भी मिटाता है।
धातु जैसे पीतल और तांबे के दीपक बार-बार इस्तेमाल किए जा सकते हैं क्योंकि ये शुद्ध, टिकाऊ और पवित्र माने जाते हैं। लेकिन मिट्टी के दीयों के मामले में शास्त्रों में अलग मत मिलता है।
क्या पुराने मिट्टी के दीये दोबारा जलाना सही है?
धर्म शास्त्रों के अनुसार मिट्टी के दीये नकारात्मक ऊर्जा को सोखने की क्षमता रखते हैं। पूजा या दीपावली में जब मिट्टी का दीया जलता है, तो वह सिर्फ रोशनी नहीं देता बल्कि आसपास की नकारात्मकता को भी अपने भीतर खींच लेता है।
इस वजह से ऐसे दीयों को दोबारा जलाना अशुभ माना गया है। ऐसा करने से पूजा का प्रभाव कम हो सकता है और घर की सकारात्मक ऊर्जा कमजोर पड़ सकती है।
पुराने दीयों का सही निपटान
शास्त्रों में पुराने दीयों को कूड़े में फेंकने की मनाही है। उन्हें सम्मानपूर्वक मिट्टी में वापस मिलाना सबसे शुभ तरीका बताया गया है।
कुछ उचित उपाय इस प्रकार हैं:
- मिट्टी में दबाएं: पुराने दीयों को पीपल, तुलसी या आम के पेड़ के नीचे मिट्टी में दबा दें। यह शुभ और पर्यावरण के लिए भी बेहतर है।
- पुनः उपयोग करें: दीयों की मिट्टी को पौधों में मिलाकर रिसाइकल किया जा सकता है।
- जल में विसर्जन न करें: बहते जल में दीये बहाने से पर्यावरण को नुकसान होता है।
नया दीया, नई शुरुआत
हर पूजा में नया दीपक जलाना शुभ माना गया है। नया दीया समृद्धि, शुद्धता और देवी लक्ष्मी के आगमन का प्रतीक होता है। नए दीपक से न केवल घर में उजाला बढ़ता है बल्कि मन में भी नई सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
इसलिए हर पूजा या त्योहार में नए मिट्टी के दीये जलाएं और पुराने दीयों को श्रद्धा से मिट्टी में मिला दें। यही शुद्ध, धार्मिक और पर्यावरण के अनुकूल तरीका है।













