Turkman Gate: दिल्ली के ऐतिहासिक तुर्कमान गेट के पास स्थित Faiz-e-Ilahi मस्जिद और उससे सटी जमीन को लेकर उठा विवाद अब सिर्फ एक स्थानीय अतिक्रमण का मामला नहीं रह गया है। यह केस सरकारी जमीन, वक्फ बोर्ड के दावे, दशकों पुराने रिकॉर्ड और न्यायिक प्रक्रिया का जटिल उदाहरण बन चुका है। इस पूरे मामले में केंद्र सरकार के विभागों से लेकर दिल्ली हाईकोर्ट तक की भूमिका सामने आई है।
कैसे शुरू हुआ विवाद
यह मामला तब सामने आया जब Save India Foundation नामक संस्था ने शिकायत दर्ज कराई। आरोप लगाया गया कि तुर्कमान गेट स्थित रमलीला ग्राउंड की सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा है और वहां शादी-ब्याह, पार्किंग, क्लिनिक और डायग्नोस्टिक सेंटर जैसे व्यावसायिक काम किए जा रहे हैं। शिकायत के बाद प्रशासनिक मशीनरी हरकत में आई।
जॉइंट सर्वे में क्या निकला
शिकायत पर संज्ञान लेते हुए दिल्ली विकास प्राधिकरण, नगर निगम दिल्ली और Land & Development Office ने संयुक्त सर्वे कराया। सर्वे रिपोर्ट में सामने आया कि लगभग 2,512 वर्ग फुट क्षेत्र पर अतिक्रमण है, जबकि कुल मिलाकर 36,428 वर्ग फुट सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा पाया गया। यहां बारात घर, पार्किंग और निजी मेडिकल सेंटर संचालित हो रहे थे।
जमीन सरकारी कैसे साबित हुई
सरकार ने 1952 से 1972 तक के रिकॉर्ड खंगाले। जांच में यह साफ हुआ कि जमीन भारत सरकार के स्वामित्व में है और L&DO के रिकॉर्ड में दर्ज है। दिल्ली वक्फ बोर्ड के नाम किसी भी प्रकार का ट्रांसफर या अलॉटमेंट दस्तावेज मौजूद नहीं मिला। इसके बाद Save India Foundation ने हाईकोर्ट का रुख किया।
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हाईकोर्ट का रुख और सुनवाई
दिल्ली हाईकोर्ट ने अवैध अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया और तीन महीने में Action Taken Report दाखिल करने को कहा, साथ ही यह भी साफ किया कि सभी पक्षों को सुनवाई का पूरा अवसर दिया जाए।
पहली सुनवाई में मस्जिद प्रबंधन ने दावा किया कि मस्जिद 100 साल से ज्यादा पुरानी है और वक्फ संपत्ति है। वहीं DDA और L&DO ने दोहराया कि जमीन हमेशा भारत सरकार की रही है।
दूसरी सुनवाई में अहम सबूत
दूसरी सुनवाई में वक्फ बोर्ड ने 1970 की गजट नोटिफिकेशन का हवाला दिया, लेकिन जमीन की स्पष्ट सीमा नहीं बता सका। इसके उलट, L&DO ने 15 फरवरी 1940 की लीज डीड पेश की, जिसमें सिर्फ 0.195 एकड़ जमीन का ही उल्लेख था।
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सरकार का अंतिम फैसला
नगर निगम के अंतिम आदेश में साफ कहा गया कि 0.195 एकड़ से ज्यादा जमीन पर कोई वैध अधिकार साबित नहीं हुआ। इस वजह से अतिरिक्त हिस्से पर बनी संरचनाएं अतिक्रमण मानी गईं और उन्हें हटाने का फैसला लिया गया। हालांकि यह भी स्पष्ट किया गया कि पूरी मस्जिद अवैध नहीं है, केवल तय सीमा से बाहर का निर्माण गैरकानूनी है।







