Mumbai: मुंबई का आज़ाद मैदान हमेशा बड़े जनआंदोलनों का गवाह रहा है। वही मैदान इन दिनों खिक्षण समाज के संघर्ष का प्रतीक बना हुआ है। दिनभर लोग आते हैं, बैठते हैं, अपनी बात रखते हैं और फिर लौटते हुए एक ही बात कहते हैं “न्याय मिला तो आंदोलन खत्म होगा, नहीं मिला तो लड़ाई जारी रहेगी।
महाराष्ट्र की राजनीति, समाज और प्रशासन के बीच इन दिनों एक ऐसा मामला गूंज रहा है जिसने सरकार पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) से जुड़े, खिक्षण समाज के प्रभावशाली नेता और पूर्व पदाधिकारी नोवल साळवे के बीच का है। आखिर ये मामला है क्या?
आखिर क्या है मामला?
मामला राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) से जुड़े, खिक्षण समाज के प्रभावशाली नेता और पूर्व पदाधिकारी नोवल साळवे पर हुए जानलेवा हमले का है। इस हमले के बाद न केवल उनका परिवार और समर्थक हिले हुए हैं, बल्कि पूरा खिक्षण समाज सड़कों पर उतर आया है।
हमले के बाद इलाज पूरा होते ही नोवल साळवे सीधे अस्पताल से आंदोलन स्थल पहुंच गए और मुंबई के आज़ाद मैदान में धरने पर बैठ गए। उनके साथ बड़ी संख्या में खिक्षण समाज के लोग, सामाजिक कार्यकर्ता और समर्थक भी जुट गए। आवाज एक ही न्याय चाहिए और तुरंत चाहिए।
क्या है आंदोलन की वजह?
नोवल साळवे पर जो हमला हुआ उसे समर्थक किसी सामान्य घटना के रूप में नहीं देख रहे। उनका मानना है कि यह सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला नहीं बल्कि पूरे समाज की आवाज दबाने की कोशिश है। यही वजह है कि गुस्सा केवल भावनात्मक नहीं बल्कि आंदोलन का रूप ले चुका है।
कई रिपोर्टों में दावा किया गया है कि हमले के पीछे गंभीर साज़िश हो सकती है। समर्थकों का आरोप है कि पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई उम्मीद के मुताबिक तेज नहीं दिख रही। यही वजह है कि आंदोलन की आवाज और तीखी होती जा रही है।
नोवल साळवे क्या चाहते है?
इलाज के कुछ ही दिनों बाद नोवल साळवे खुद आज़ाद मैदान पहुंचे। समर्थकों के बीच बैठ कर उन्होंने साफ संदेश दिया कि वह पीछे हटने वाले नहीं हैं। उनके मुताबिक, अगर दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो यह सिर्फ एक नेता का नहीं बल्कि पूरे समाज का अपमान होगा।
आंदोलन स्थल पर बैठी महिलाएं हों या युवा, हर किसी की जुबान पर एक ही बात कि हमले की जांच तेज हो, आरोपियों को कड़ी सज़ा मिले और प्रशासन अपनी जिम्मेदारी निभाए।
कौन-कौन है इस आंदोलन में शामिल?
यह आंदोलन अब सिर्फ एक समुदाय तक सीमित नहीं रह गया है। कई सामाजिक संगठन, स्थानीय नेता, धार्मिक संस्थाओं से जुड़े लोग और समाजसेवी अब खुलकर इस आंदोलन के समर्थन में आ रहे हैं। कई जगहों पर समर्थन पत्र दिए गए, प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री तक पहुंचा, गृह विभाग को ज्ञापन सौंपा गया। समर्थकों का कहना है कि अगर प्रशासन चुप रहा, तो आंदोलन सिर्फ आज़ाद मैदान तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि राज्यभर में फैलेगा।
कार्रवाई धीमी क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है। समर्थकों का आरोप है कि हमला इतना गंभीर था, मामला स्पष्ट है, फिर भी कार्रवाई की रफ्तार उम्मीद के मुताबिक तेज नहीं दिख रही।
लोगों का कहना है कि इतने दिनों के बाद भी आरोपियों की गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई, कड़ी कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की गई है, जांच तेजी से क्यों नहीं की जा रही है। आंदोलन कर रहे लोगों का कहना है कि तीनों पर ठोस प्रगति नजर नहीं आ रही। यही बात लोगों के आक्रोश को और बढ़ा रही है।
न्याय में देरी क्यों?
घटना ने सिर्फ सामाजिक स्तर पर झटका नहीं दिया बल्कि राजनीतिक हलकों में भी हलचल पैदा कर दी। विपक्षी नेताओं का कहना है कि अगर ऐसा हमला होने के बाद भी कार्रवाई तेज न हो, तो यह कानून व्यवस्था पर बड़ा सवाल है। कुछ स्थानीय नेताओं ने यह तक कहा कि अगर ऐसे मामले में सरकार चुप बैठ गई तो यह गलत संकेत जाएगा कि नेता और सामाजिक कार्यकर्ता सुरक्षित नहीं।
सरकार से क्या मांग?
आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगें साफ हैं
हमले की तेज और निष्पक्ष जांच हो
आरोपियों पर सख्त कार्रवाई हो
सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जाए
इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए ठोस सिस्टम बनाया जाए
इसके साथ समर्थकों का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक घटना नहीं बल्कि पूरे समाज के आत्मसम्मान का सवाल है।








