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Aravalli Hills: अरावली हिल्स को लेकर क्यों मचा है बवाल? समझिए विवाद की जड़ और पूरा बैकग्राउंड

On: December 23, 2025 9:20 PM
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Aravalli Hills
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Aravalli Hills: आज हम अरावली हिल्स पर बात करेंगे, जिसके बारे में सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 20 नवंबर, 2025 को माइनिंग के मामले में पहाड़ियों के लिए एक जैसी परिभाषा अपनाई थी। हालांकि, यह मामला अब एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है।

सुप्रीम कोर्ट अरावली हिल्स की परिभाषा और उससे जुड़े 100 मीटर के नियम को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया है। यह याचिका हरियाणा के रिटायर्ड फॉरेस्ट ऑफिसर आरपी बलवान ने दायर की थी। 17 दिसंबर को अपने आदेश में कोर्ट ने इस मामले पर केंद्र सरकार, हरियाणा और राजस्थान सरकारों और पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से जवाब मांगा था।

यह मामला इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि अरावली हिल्स उत्तर-पश्चिमी भारत के पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। एक्सपर्ट्स का मानना ​​है कि परिभाषा में थोड़ा सा भी बदलाव भविष्य में बड़े पर्यावरण संकट का कारण बन सकता है।

क्या है पूरा विवाद?

यह विवाद अरावली हिल्स के लिए एक जैसी परिभाषा तय करने के इर्द-गिर्द घूमता है। नवंबर 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की एक कमिटी की सिफारिश को मानते हुए कहा कि सिर्फ़ लोकल ज़मीन से 100 मीटर या उससे ज़्यादा ऊँची पहाड़ियों को ही अरावली रेंज का हिस्सा माना जाएगा। उनकी ढलानें और आस-पास की ज़मीन भी इस परिभाषा में आएगी।

पिटीशनर आरपी बलवान का तर्क है कि यह परिभाषा 100 मीटर से कम ऊँची पहाड़ियों को कानूनी सुरक्षा से बाहर कर देगी, जिससे माइनिंग और कंस्ट्रक्शन एक्टिविटीज़ के लिए दरवाज़ा खुल सकता है।

एडवोकेट गांधी के एक लेटर की कॉपी भारत के प्रेसिडेंट को भी भेजी गई है। इस लेटर में अरावली पहाड़ियों और रेंज की परिभाषा पर पर्यावरण मंत्रालय की सिफारिश को मंज़ूरी देने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का रिव्यू करने की मांग की गई है।

100 मीटर से कम ऊँची पहाड़ियों को खतरा

आरपी बलवान का तर्क है कि अरावली रेंज सिर्फ़ ऊँची पहाड़ियों तक ही सीमित नहीं है। इसकी छोटी पहाड़ियाँ भी उतनी ही ज़रूरी हैं क्योंकि वे पानी बचाने, बायोडायवर्सिटी और रेगिस्तान बनने से रोकने में मदद करती हैं। अगर 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों को अरावली रेंज का हिस्सा नहीं माना जाता है, तो बहुत सारे इलाके कानूनी सुरक्षा खो देंगे। इससे गैर-कानूनी माइनिंग, रियल एस्टेट एक्टिविटी और पेड़ों की कटाई बढ़ने का खतरा है।

किस राज्य के पर्यावरण पर असर पड़ेगा?

अरावली पर्वत रेंज गुजरात से राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है। इसे थार रेगिस्तान को फैलने से रोकने वाली एक नैचुरल रुकावट माना जाता है।

पिटीशनर के मुताबिक 100 मीटर का नियम लागू होने से सिर्फ एक राज्य ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर-पश्चिमी भारत का पर्यावरण प्रभावित होगा। इससे ग्राउंडवाटर लेवल में गिरावट, हवा की क्वालिटी में गिरावट और तापमान में बढ़ोतरी हो सकती है।

एनवायरनमेंटलिस्ट की चेतावनी

एनवायरनमेंटलिस्ट अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को लेकर काफी परेशान हैं। एक्सपर्ट्स का दावा है कि कमजोर कानूनी सुरक्षा के कारण यह परिभाषा अरावली क्षेत्र के लगभग 90 प्रतिशत हिस्से को खतरे में डाल सकती है। एनवायरनमेंटलिस्ट गांधी ने अपने लेटर में कहा कि 100-मीटर के नियम से इकोलॉजिकली ज़रूरी इलाकों को बाहर करने का खतरा है, जो ऊंचाई की ज़रूरत को पूरा नहीं करते हैं, लेकिन एनवायरनमेंट के लिए बहुत ज़रूरी हैं। उन्होंने निचली पहाड़ियों और वॉटर रिचार्ज एरिया को बचाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।

सरकार का क्या रुख है?

यूनियन एनवायरनमेंट मिनिस्टर भूपेंद्र यादव ने कहा है कि 100-मीटर के नियम का विरोध गलतफहमी पर आधारित है। उनका कहना है कि जब तक एक सस्टेनेबल और साइंटिफिक माइनिंग प्लान नहीं बन जाता, तब तक किसी भी नई माइनिंग लीज़ की इजाज़त नहीं दी जाएगी। मिनिस्ट्री का दावा है कि यह परिभाषा राजस्थान में 2006 से लागू है और इससे अरावली इलाके का ज़्यादातर हिस्सा सुरक्षित रहेगा।

माइनिंग पर पहले का सख्त रुख

सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी अरावली में अनकंट्रोल्ड माइनिंग के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने गुरुग्राम, फरीदाबाद और नूंह जैसे इलाकों में माइनिंग पर सख्त रोक लगाई थी। कोर्ट का कहना है कि अरावली को हुआ नुकसान लगभग ठीक नहीं हो सकता और इसका सीधा असर पानी, हवा और बायोडायवर्सिटी पर पड़ता है।

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पुराने गोदावर्मन केस से जुड़ा केस

यह पिटीशन 1996 के मशहूर टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया केस से भी जुड़ी है। उस केस में, सुप्रीम कोर्ट ने “जंगल” को बड़े पैमाने पर डिफाइन किया था, जिसमें कहा गया था कि न सिर्फ़ सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज जंगल, बल्कि वे इलाके भी जो असल में जंगल जैसे हैं, कंजर्वेशन के दायरे में आएंगे। पिटीशनर का तर्क है कि 100 मीटर का नियम जंगलों और पहाड़ियों को पूरी तरह से सुरक्षा देने की भावना के खिलाफ है।

मिनिस्ट्री के एफिडेविट पर उठाए गए सवाल

आर.पी. बलवान ने एनवायरनमेंट मिनिस्ट्री के एफिडेविट में भी विरोधाभास का आरोप लगाया है। उनका दावा है कि एक तरफ, मिनिस्ट्री कंजर्वेशन की बात करती है, और दूसरी तरफ, वह एक ऐसी डेफिनिशन को बढ़ावा देती है जो बड़े इलाकों को सुरक्षा से बाहर कर सकती है। उनके अनुसार यह सिर्फ़ एक टेक्निकल मामला नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के एनवायरनमेंट से जुड़ा सवाल है।

अरावली का एनवायरनमेंटल महत्व

अरावली रेंज को दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक माना जाता है। यह न सिर्फ़ थार रेगिस्तान को फैलने से रोकती है, बल्कि बारिश के पानी को ज़मीन में रिसने देकर ग्राउंडवॉटर लेवल बनाए रखने में भी मदद करती है। इसके अलावा अरावली क्षेत्र बायोडायवर्सिटी का एक बड़ा केंद्र है, जहाँ कई दुर्लभ पौधों और जानवरों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं।

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आगे क्या हो सकता है?

अब सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या होगा। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, हरियाणा और राजस्थान राज्य सरकारों और पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से जवाब माँगे हैं। सभी पक्षों से जवाब मिलने के बाद, कोर्ट यह तय करेगा कि 100 मीटर के नियम में बदलाव ज़रूरी है या नहीं।

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना ​​है कि इस फैसले का असर आने वाले कई दशकों तक रहेगा और यह तय करेगा कि अरावली रेंज को कितनी कानूनी सुरक्षा मिलेगी।

Sapna Srivastava

सपना श्रीवास्तव को हिंदी पत्रकारिता में दो साल का अनुभव है। उन्होंने इंडिया न्यूज़ समेत कई प्रमुख मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में वह डाइनामाइट न्यूज़ और आज का आइना के लिए राष्ट्रीय, राजनीतिक, ब्रेकिंग, लाइफस्टाइल, खान-पान और फैशन जैसे विषयों पर लिखती हैं।

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